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//// वक्त्त ही ठगता रहा////

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Hindi Poetry

बस वक्त्त ही ठगता रहा है मुझे हर मोड़ पर /
इसीलिए तुम भी चले गये दिल तोड़ कर /
तुम बेवफा पहले तो ना थे /
खफा हुए थे बदले तो ना थे /
यु ही तो नही चले आये थे रीतिरिवाजो को छोड़ कर /
बस वक्त्त ही ठगता रहा है मुझे हर मोड़ पर /
इसीलिए तुम भी चले गये दिल तोड़ कर /

मैंने जब भी कोई सपना बुना ,तुम्हे बेदखल नही किया /
मगर जरा सी जुदाई का तुमने हलाहल नही पीया /
खुशियों को कुबूल कर चले गये गमो के जाम छोड़ कर /
बस वक्त्त ही ठगता रहा है मुझे हर मोड़ पर /
इसीलिए तुम भी चले गये दिल तोड़ कर /

10 /04 /1992

4 Comments

  1. Vishvnand says:

    सुन्दर रचना मन भायी
    वख्त नहीं वो ठग रहे हैं भाई

    कुछ गल्त छपे शब्दों को सुधारने की जरूरत है

    हर वख्त हम कहते है वखत ने ठगा है
    जब हर वख्त हम ही हैं जो वख्त को ठगने जाते हैं

  2. s.n.singh says:

    good one

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