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ज्ञान पिपासु की विडम्बना!

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हे प्रभो,
इस युग में ज्ञान पिपासु की विडम्बना,
सिर्फ आप ही जानो हो,
सत्य का आधार ज्ञान है,
ज्ञान का आधार सत्य है,
तो फिर इस युग में क्या कीजे?
यहाँ सत्य ओझल है,
और जिसे ज्ञान कहा गया,
वह मरीचिका के सामान है,
प्रयास करने से भी प्यास नहीं बुझती |
सत्य का बोध तो नहीं,
जहाँ सत्य का निवास है,उसका बोध है,
मगर वहां जाना दु:साध्य है,
और असत्य को ज्ञान समझना दुष्कर है|
क्या कभी ऐसा युग भी था?
जहाँ असत्य का अस्तित्व नहीं था,
जहाँ ज्ञान जड़ों में था और सत्य हर सत्ता में,
वह ज्ञान पिपासु का स्वर्ग ही होगा,
प्रभु, क्या उस युग का स्वर्ग,
इस युग में नहीं आ सकता?
विस्तार नहीं तो लघु रूप ही,
क्यूंकि ज्ञान का उघाड़,
आतंरिक और बाह्य स्वरुप का,
एक स्वरुप हो जाना ही है,
क्या मेरा अंतर्मन और बाह्य,
ज्ञान स्वरुप होगा?
क्या इस युग में ऐसा होगा,
या अभी कई और युग बाक़ी हैं?

अनुराग

4 Comments

  1. Vishvnand says:

    बहुत मनभायी यह सुन्दर भावनिक रचना
    विषय पर प्रभु से सात्विक अर्थपूर्ण याचना
    क्या करें जब बनता जा रहा ऐसा ज़माना?

    Hearty commends

  2. s n singh says:

    sundar abhivyakti.

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