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अलका

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का  

म्बे क्षमी कालिका,

तीनों तुझमे समाय |

ॐ कहे सुन प्रेयसी,

ग मिथ्या भरमाय ||

जग मिथ्या भरमाय,

नहीं तू अब तक समझी | 

मूल्यवान गजदंत और को,

स्वयं दाढ़ ही अच्छी ||

4 Comments

  1. Vishvnand says:

    बहुत बढ़िया और अर्थपूर्ण
    रचना लागी मनभावन
    commends

    बात क्या भयी
    बहुत समय बाद हुआ आपका शुभ आगमन ?

    • dr.o.p.billore says:

      @Vishvnand,
      आदरणीय श्री विश्वनंदजी ,सदर प्रणाम |
      पूरे दो वर्षों के बाद आप सब साहित्य श्रजन कर्ताओं के दर्शन हुए |व्यस्तताओं के कारण इस चौपाल पर नहीं आसका| आशा है पूर्ववत आप सभी का स्नेह प्राप्त होता रहेगा |
      आप सबको प्रणाम |

  2. siddha nath singh says:

    suswagat, मित्थ्या नहीं सर मिथ्या.

    • dr.o.p.billore says:

      @siddha nath singh,
      आपका आभार ,
      इसी तरह शुद्धि करण चलता रहे
      तो भाषा शुद्ध और संपर्क प्रगाढ़ होता रहेगा |
      धन्यवाद |

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