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मेरे देश की जेठी दुपहरी

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Hindi Poetry

                       मेरे देश की जेठी दुपहरी

                                                सुधा गोयल ‘नवीन’

वहां मेरे देश की, जेठी-दुपहरी में,
लम्बे सफ़र का थका हारा सूरज,
अमवा की छैय्या में रोज सुस्ताता है,

गर्म हवा के झकोले से, आम रसीला हो जाता है,
लड़कन की टोली गुलेलवा ले भागे
देख न ले मैय्या, आँख मिचौली में मजा आता है,
तरबूज, खरबूज  की करधनी पहने,
नदिया की पतली होती कमर पर,
कभी रहम तो कभी तरस बहुत आता है
अमवा की छैय्या में सूरज सुस्ताता है.

महक  मोगरा, चमेली, गंधराज की,
जैसे दुखते छालों पर मरहम लग जाता है.
कुहुक उठती  कोयल जब,
सातों सुरों का मेला, उमंग से बुलाता है.
अमवा की छैय्या में सूरज सुस्ताता है.

दूर पहाड़ों पर अकस्मात् झांकता अनल,
क्षितिज छूने की कोशिश में,
नित नवीन आकृतियों का भ्रम जाल फैलाता है,
अमवा की छैय्या में सूरज सुस्ताता है.

काला, सूना, सर्पाकार रास्ता,
मृग-तृष्णा सामान, पानी को ललचाता है, 
मंजिल अब दूर नहीं, पुचकारता, उकसाता है.
वहां मेरे देश की, जेठी-दुपहरी में,
लम्बे सफ़र का थका हारा सूरज,
अमवा की छैय्या में रोज सुस्ताता है,

सुधा गोयल  ‘नवीन’

3 Comments

  1. Kusum Gokarn says:

    Sudhaji,
    Fine evocative imagery that one can visualise while reading your lovely poem.
    Kusum

  2. Vishvnand says:

    अति सुन्दर मनभावन रचना
    द्रश्य कथन से मन आनंद समाना
    बहुत खूब

  3. siddha nath singh says:

    achchhi chitratmak rachna

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