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प्रेम गीत: एक आदिम नाच

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Hindi Poetry

आज मुझमें
बज रहा
जो तार है
वो मैं नहीं-
आसावरी तू

एक स्मित रेख तेरी
आ बसी
जब से दृगों में
हर दिशा तू ही दिखे है
बाग़- वृक्षों में-
खगों में

दर्पणों के सामने
जो बिम्ब हूँ
वो मैं नहीं-
कादम्बरी तू

सूर्यमुखभा, कैथवक्षा!
नाभिगूढा!
कटिकमानी
वींध जाते ह्रदय मेरा
मौन इनकी
दग्ध वाणी

नाचता हूँ
एक आदिम
नाच जो
वो मैं नहीं-
है बावरी तू

2 Comments

  1. Siddha Nath Singh says:

    बहुत प्यारी रचना रस से ओत प्रोत ,परन्तु एक स्थल पर लिंग विसंगति दिखी-
    सूर्यमुखभा, कैथवक्षा!
    नाभिगूढा!
    कटिकमानी
    वींध जाते ह्रदय मेरा
    मौन इनकी
    दग्ध वाणी
    इसमें बींध जाती ह्रदय मेरा लिखा जाना शायद सही होगा,क्यों?

  2. Vishvnand says:

    बड़ी सुन्दर अभिव्यक्ति और अलग ढंग की रचना
    बहुत मन भायी

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