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नाम का कमाल है यारों. ….!

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Hindi Poetry, Uncategorized


नाम  का कमाल है  यारों. ….!

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तब शायद 1980 साल था चल रहा
शहर में दफ्तरों के इलाके में एक नया “रेस्तोरां और बार” खुला
उसका गल्ला बहुत जोरों से दिन ब दिन बढ़ने लगा
शाम को ऑफिस छूटने के बाद वो अफसरों का अड्डा बन गया
कई अफसर ऑफिस छूटने के बाद सीधे दौड़े दौड़े वहां जाते
वहां बैठकर उस बार से खुशी खुशी अपने घर टेलीफ़ोन लगाते
“ मै यहाँ ऑफिस में हूँ, घर पहुँचने लेट होगा “.
ये कुछ झूठ नहीं था, बार का नाम ही “ द ऑफिस ” था
उस बार का ये नाम ही अफसरों और बार के लिए बड़े कमाल का था ….!

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हमारी राजनीति में भी नाम का कमाल स्वतन्त्रता से लेकर आज भी है …..!
सीधीसाधी जनता किसी बड़े पुण्य स्वर्गीय नेता के उपनाम को नही भूली है
इसीके आधार पर जो उनके वंशज नही पर उपनाम वही है आज भी वोट पर वोट लेते हैं
देश के बड़े नेता समझे जाते हैं देशभक्ति का व्यापार करना अपना हक़ सा मानते हैं
कुछ बड़े बने व्यक्ति शादी होने पर नाम मे पति का नही पिता का उपनाम लगाते है
पिता उपनाम से विशिष्ट समाज को खुश कर चुनाव जीत बड़े पदाधिकारी बनते हैं
कुछ उसी तरह जैसे “ द ऑफिस ” अपने नाम से कमाल करता रहता है ……!
नाम का ये बड़ा  खेल है यारों  इसे समझ समझाकर जल्द नाकामयाब करना है यारों !

 

” विश्वनंद “

6 Comments

  1. sushil sarna says:

    बात तो बिलकुल सही है-नाम और ब्रांड बस इन दोनों की ही महिमा है -सामाजिक व्यवस्था पर गहरा कटाक्ष-बड़ी मनभाई ये आपकी रचना-बधाई सर जी

  2. siddha nath singh says:

    bahut khoob.

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