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—/ तू विश्वरूप धर के विराट एक बार धरा पर आ जा /—

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Hindi Poetry

तू विश्वरूप धर के विराट एक बार धरा पर आ जा /
पाप पुन्य में हो संघर्ष एक और महाभारत रच जा /

गीता के श्लोक सिमट कर,
प्रवचनों में ही आते है /
रामायण सिसकती गठरी में,
कोई चौपाई नही दोहराते है /
गीता के वो गीत रामायण की लय में सुना जा /
तू विश्वरूप धर के विराट एक बार धरा पर आ जा /

विचलित है मानव का मन ,
संवेदनाओ से नाता टूट गया /
अज्ञान की काली रात है ,
वो ज्ञान का दीपक बुझ गया /
एक बार बिखेरता पूरब से बन तू सवेरा आ जा /
तू विश्वरूप धर के विराट एक बार धरा पर आ जा /

श्र्धाये अपवित्र हुई ,
संस्कृति के भूले संस्कार /
खंड खंड हो गई आशाये,
विश्वास करता है हाहाकार /
दिलो की इस खाई को एक बार तो भरने आ जा /
तू विश्वरूप धर के विराट एक बार धरा पर आ जा /

रासलिलाये वासना में बदली ,
तोड़ दिए रिश्तो के बंधन /
गिरती मानवता से स्तब्ध गिरि,
भू में आते है कम्पन /
जवालामुखी बन फुट ,धह्कते लावे में अमानुषता को दबा जा /
तू विश्वरूप धर के विराट एक बार धरा पर आ जा /

सत्य की आलोचनाये होती ,
ईमान की होती है निंदा /
अधर्मी शैतानो ने ,
रहने न दिया मानवता को जिन्दा /
तू बुझे मन में चेतना के दीप प्रज्वलित करने आ जा /
तू विश्वरूप धर के विराट एक बार धरा पर आ जा /
पाप पुन्य में हो संघर्ष एक और महाभारत रच जा /

4 Comments

  1. Vishvnand says:

    सुन्दर भावनिक और अर्थपूर्ण रचना
    शायद नज़दीक है रचना की प्रार्थना प्रभु को मान्य होना
    बहुत मन भायी
    हार्दिक बधाई

  2. Siddha Nath Singh says:

    do ek jagah matra kee galtiyan bhula den to laajvaab kavita.
    फुट- फूट ,रासलिलाये-रास लीलाएं

    • Narayan Singh Chouhan says:

      @Siddha Nath Singh,

      बहुत बहुत धन्यवाद सिंह साहब …मात्राओ की गलती को सुधरने का प्रयास करुगा आपका मार्गदर्शन मिलता रहे

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