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मेरा सच

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Hindi Poetry
तुम मुस्लिम हो सो तुम्हें भगवान् के खिलाफ बोलने का हक़ नहीं
वैसे ही – जैसे मुझे अल्लाह के विरुद्ध बोलने का अधिकार नहीं.
क्योंकि हम धर्मनिरपेक्ष हैं
हमसे अपेक्षा की जाती है कि हम सिर्फ अपने धर्म के बारे में बोलें.
लेकिन फिर जो ताकतवर है – वही सच्चा है
जिसके पास बहुमत है – भीड़ है – वही पुण्यात्मा है.
धर्म की डुगडुगी अंधों की जागीर है –
और दूसरों की जागीर पर पैर रखने वालों का
सर काट देना – बहुत ही साधारण, न्यायप्रिय एवं धार्मिक बात है.
क्योंकि तुम्हारे कद से ज्यादा – मेरे अहम् की औकात है.
सो, तुम्हारा कहना अगर मुझे चुभेगा – तो तुम्हें डराऊंगा ही.
धर्मोचित है – कि तुम्हें नोच खाऊँगा ही.
जितना लिखोगे – मिटाऊँगा ही.
और धोखे में न रहना – मुझे भी सच की परवाह है.

सच सापेक्ष होता है –
और मैं अपना सच – तुमसे ऊंचे सुर में
गाऊंगा ही, चिल्लाऊंगा ही.

3 Comments

  1. amit478874 says:

    सोच नयी… सच वही…!! बहुत बढ़िया… 🙂

  2. s n singh says:

    tafaraqe aur kar rahin zyada kab kitabon se roshnee hogi.

  3. Vishvnand says:

    आज के हालात पर उत्कृष्ट और प्रभावी कटाक्ष
    अति सुन्दर रचना और अंदाज़-ए-बयाँ
    Kudos

    सच को गुंडों बदमाशो ने कैद कर रखा है
    और जो झूट है उसे सच जबरजस्ती ठहराए जा रहे हैं
    अगर वो कहते दो और दो पांच होते हैं
    तो सब को हाँ कह कर मुंडी हिला देना पड़ता है
    और ऐसा मान कर चलने से सब सवालों के उत्तर गलत होते हैं
    पर फिर भी उन्हें सच और सही मान लिया जाता हैं
    बड़ी विकट परिस्थिति है 🙁

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