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भोग की वस्तु

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Hindi Poetry

स्त्री भोग की वस्तु नहीं,
मनुष्य भोग की वस्तु नहीं,
धर्म हमें यह सिखाता है,
बारंबार समझाता है।

क्या यह सत्य है,
या सत्य को नकारता है,
धर्म का दृष्टिकोण है,
अपना पक्ष बतलाता है।

आम नर-नारी की सोच,
शायद धर्म के विपरीत है,
इन रिश्तों में केवल,
भोग का संगीत है।

भोग के रिश्तों में,
कभी सुख कभी दुःख,
जो भोगी नहीं,
क्या जाने सुख-दुःख।

One Comment

  1. Vishvnand says:

    बहुत खूब और अर्थपूर्ण है रचना का अंदाज़ ए बयाँ
    अगर इसे समझें तो स्वर्ग सा हो जाए सारा समा
    अध्यात्मिक रहन सहन ही देता है दुनिया में आनंद
    जो होता है हीन भोग और भौतिक सुख दुःख के बिलकुल परे

    सुन्दर रचना के लिए हार्दिक अभिवादन

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