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मैं कभी- कभी कह लेता हूँ कोई ग़ज़ल………..

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शाम के बेनूर चेहरे दीवारों का सहारा लिए चले जा रहे थे
जाने कितनी सदियों की थकन थी उन बुज़ुर्ग क़दमों में……
और वहीँ कहीं शाम से अपना दिल भी सहमा हुआ गुज़र रहा था
उन पगडंडियों से जिनके हर मोड़ पर
बदगुमानियों के दो राहे थे
जिसमे एक राह में क़दम यूं ही बेपरवाह चले जा रहे थे
एक साया जो रहा था तमाम उम्र सर पर मेरे
अंधेरों में कहीं वो घुलता जा रहा था
कई उम्मीदों के चराग़ जलाये मगर अँधेरे मजबूत और चराग़………
कमज़ोर साबित हुए
थी वो एक तन्हा शमा जिसने संभाल रखा था
साये को मगर जैसे अंधेरों की कोई बाढ़ सी थी
डूब गया वो साया उन्ही अंधेरों की लहरों में कहीं
एक ख़बर आई की हुआ मैं तन्हा इस दुनियाँ में न कोई राह देखेगा मेरी
अब न कोई देगा आवाज़ मुझे……….
वो ऊँगली वो कन्धा वो सख्त सीना वो दबीज़ आवाज़ की सदायें
सब डूब गयी उन  लहरों में कहीं
एक चेहरा मिला तो था
सफ़ेद चादर में लिपटा हुआ
जैसे रात की तमाम सयाही वो पोछने लाये हों साथ
कहाँ ऐसा मुमकिन था
मैं अश्कों में वो कब्र में दफ़न हैं इसी शहर में
होती तो है मुलाक़ात मगर कोई बात नहीं हो पाती है
चार बरस हुए शायद आज एक
अँधेरी रात है और वो भी एक अँधेरी रात थी
अब न कोई ग़ालिब न हाली न सरमद न खुसरो की बातें होती हैं
मैं कभी- कभी कह लेता हूँ कोई ग़ज़ल
और कलम मेरी हर्फों
की तंगहाली पर रोती है………….

6 Comments

  1. Vishvnand says:

    वाह , बहुत मनभायी ये अलग सी बात और इसका अंदाज़ ए बयाँ
    और हम दुआ करते हैं कि बार बार आपका मन चाहे शकील
    अपने खूबसूरत अंदाज़ की गज़लें और नज्में लिखते रहना…….

    सुन्दर पोस्टिंग के लिए हार्दिक बधाई

  2. sushil sarna says:

    क्या अंदाज है शकील साहिब, वाह वाह कहने से हम चूक नहीं सकते

  3. jaspal kaur says:

    बहुत अच्छी रचना.

  4. Reetesh Sabr says:

    बहुत खूब बयानी…यह भाग तो यूँ लगा जैसे हमारे ‘भाग’ से मिला हो पढने…
    सफ़ेद चादर में लिपटा हुआ
    जैसे रात की तमाम सयाही वो पोछने लाये हों साथ
    कहाँ ऐसा मुमकिन था
    मैं अश्कों में वो कब्र में दफ़न हैं इसी शहर में
    होती तो है मुलाक़ात मगर कोई बात नहीं हो पाती है
    चार बरस हुए शायद आज एक
    अँधेरी रात है और वो भी एक अँधेरी रात थी

    पूछ सकता हूँ ये किनसे मुखतिब है नज़्म…किनको हुए ४ बरस?

  5. siddhanathsingh says:

    behtareen

  6. kusum (pooja) says:

    आप कुछ कहें न कहें शकील जी,

    कुछ दिल की बातें होती है,
    जो जोरोसे शोरोसे किसीको कहने का मन होता है…
    कुछ पूरानी दर्दभरी यादें इस तरह से अपने आप ग़ज़ल बन आ जाती होठोंपर …. और लोग कहते है …वाह शकील जी क्या लिखा आपने…
    जब की खुद को यकीन नहीं होता की यह जो दिल का दर्द है जो बताना भी चाहता था मै मेरे दोस्तों को, समझ तो नहीं पाए मगर दिल को दर्द दे गए … मेरे दर्द की वाहवाई कर…

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