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“बसंत-बहार”

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Hindi Poetry

                            “बसंत-बहार”
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बगिया बगिया पुष्प प्रफुल्लित, बहुरंगी है छटा चहुँ ओर,
लहराती फहराती वट शाखाएँ, नाचते कूहते मनोहर मोर !
धूप सुहानी सुनहरी पसरती, पूर्व दिशा से झलकती आयी,
नील गगन की नीलिमा ढ़कती, धवल मेघ पंक्ति है छायी !
क्रीडा करते पशु-पक्षी, जिनका श्रवणप्रिय सुमधुर कलरव,
भोर-भ्रमण करते नर-नारी, आगया जो है बसंत अभिनव !
नवल वरवसन से आभूषित, मंदिर मंदिर में दर्शन-पूजन,
भोग-प्रसाद हेतु सजे हुए हैं भिन्न भिन्न रुचिकर व्यंजन !
ऋतु बसंत में हरियाली अरु फुलवारी से ऐसी सजी है धरा,
मानो जैसे नवेली दुल्हन सम सजी-धजी हो कोई अप्सरा !
इसी शुभ घड़ी में होते हैं समाज में बहुतेरे वैवाहिक सम्बन्ध,
यत्र तत्र घोड़ी में बैठे जाते दूल्हे दुल्हन के घर करने अनुबंध !
माँ वसुंधरा में ही है होता ऐसा सानंद महोत्सव का आयोजन,
जो मानव में सामाजिकता लाने का ही एक मात्र है प्रायोजन !
स्वर्ग-नरक सब यहीं है जिसका भोग-उपभोग है कर्मगति से,
सत्कर्मों के करने से ही मुक्ति मिलती है दु:खद नर्कगति से !
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2 Comments

  1. Vishvnand says:

    Achchii rachanaa .
    Bhaavaarth bahut man bhaayaa

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