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वो ‘कल’ थे…

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Hindi Poetry

वो हसते थे, वो मुस्कुराते थे…
हमें भी वो थोडा हसाते थे…!

वो लडखडाते थे, वो रोते थे…
हमें भी कभी कभी थोडा रुलाते थे…!

वो सोते थे, वो जागते थे…
हम उसकी परछाई के पीछे भागते थे…!

वो चेहरा था, वो सेहरा था…
हमारी ज़िन्दगी में उसका ‘पेहरा’ था…!

वो सुर थे, वो साझ थे…
हमारे लिए तो वो ‘आवाज़’ थे…!

वो लम्हे थे, वो पल थे…
कभी न लौट कर आने वाले वो “कल” थे…!

-Amit T. Shah (Mas)
26the January 2012

4 Comments

  1. Vishvnand says:

    वाह , बहुत अच्छे मन भायी
    आज भी तो वैसे दिखने में कल जैसा ही है
    पर फिर भी कल जैसा बिलकुल नहीं

    • amit478874 says:

      @Vishvnand, Thank you Sir for your comment. I missed the last stanza, here it is…
      “वो लम्हे थे, वो पल थे…
      कभी न लौट कर आने वाले वो “कल” थे…!”

      Nice to have visit here & hear you after a long time. Hope you are doing well as always. 🙂

  2. rajendra sharma'vivek' says:

    Vo koun the kripayaa bataaye

    • amit478874 says:

      @rajendra sharma’vivek’, ओह…! माफ़ कीजियेगा बरखुरदार… ये रही आखरी पंक्ति जो लिखना भूल गए थे…
      वो लम्हे थे, वो पल थे…
      कभी न लौट कर आने वाले वो “कल” थे…!
      🙂

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