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Hindi Poetry

कुछ कवितायें – जिनपर तुम तालियाँ बजाते हो
को मैं गालियाँ देने की हद तक भी पसंद नहीं करता.
और कुछ पंक्तियाँ –
जिन्हें तुम कविता मानने से भी इनकार करते हो
को पढ़ते पढ़ते
सिहर जाता है मेरा रोम रोम.

ठीक ही है ना?
आखिर मेरी और तुम्हारी उम्मीदें,
और कविता के प्रति मोह अलग अलग है.
मेरी समझ उतनी प्रबुद्ध नहीं –
कि मैं इंटेलेक्चुयल गिना जाऊं.

मेरी छोटी सी समझ में
एक समग्र विचार अट ही नहीं सकता.
एक परिपूर्ण इतिहास, एक बौद्धिक चेतना की तो बिलकुल जगह नहीं
(समय भी नहीं उतना)

सो, मैं एक छोटे शहर से निकल के
एक बड़े शहर में आने वाली –
तुम्हारे पैमानों से अनुभवहीन –
एक छोटी लड़की की
बड़ी कवितायें पढ़ के सिहर उठता हूँ.

सुन रहे हो तो कह दूं
कि मुझे फर्क नहीं पड़ता –
और लड़कियों कि कवितायों को
‘लाईक’ करने में शर्म महसूस नहीं होती.
एक दिन तुम्हे भी पसंद कर लूं शायद –
जब तुम पूर्वाग्रह से परे होकर – समझ सको –
कि अनुभव का उम्र से कोई वास्ता नहीं.

6 Comments

  1. Siddha Nath Singh says:

    akbar ilahabadi ka sher arz karunga-
    दलीलें फलसफे को नूरे बातिन कर नहीं सकतीं
    तुझे ये डिग्रियां बूढों का हंसीं कर नहीं सकतीं .

  2. rajendra sharma'vivek' says:

    Is vishay par ratlam ke pro.azhar hashami ji ka yah sher hai
    “yuvaa abhimanyu jab bhi vyuh rachanaa bhedane aayaa
    bujurgo ki koi peedhi bani hai raah kaa rodaa

  3. Vishvnand says:

    bahut badhiyaa kuch gahan baat bataati huii,
    kavitaa kisko kaise aur kyon bhaaye. kuch logic samjhaatii huii vaichaarik, manbhaavan saral ur utkrasht
    hardik badhaaii

    naa umr kii seemaa ho naa janm kaa ho bandhan
    jab payaar kare koii to dekhe keval man
    kavitaa kaa aisaa hii shaayad hotaa bhii ho janam
    tum haar ke dil apanaa ye jeet buland kar do …..

  4. neeraj guru says:

    सिर्फ एक बात –
    मुझे सच कहने का सलीका नहीं आता,
    इसलिए – मुझसे मुआफी की उम्मीदे भी न रखो,
    क्योंकि – मैं बे-सलीकेदार ज़रूर हूँ –
    पर बदतमीज नहीं.

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