« »

‘पुतलों’ पर कपडा और,गरीब बिना कम्बल के सोता है……..

0 votes, average: 0.00 out of 50 votes, average: 0.00 out of 50 votes, average: 0.00 out of 50 votes, average: 0.00 out of 50 votes, average: 0.00 out of 5
Loading...
Hindi Poetry

‘पुतलों’ पर कपडा और,गरीब बिना कम्बल के सोता है……..

 

अच्छा हुआ आपने,

उन्हें ढँक दिया पूरा,  

ठंडसे वरना उनका,

हाल होता बुरा,

‘टीम’ भी अब ठंडसे,

हो गई है कुल,

भ्रष्टोंके प्रवेश से,

मुरझा रहा ‘फुल’,

सवारी ‘हाथी’ की जाने,

किसको रास आयेगी,

‘हात’ ना मिलाया किसीसे,

तो ‘हार’ की नौबत आएगी, 

पुतलों को ढंकने,

खर्ची करोडो की ‘माया’

उसका भी सोचो जो ठंडमे, 

फुटपाथपर नंगे बदन सोया,

लोकतंत्र में शायद ,

ऐसा ही होता है,

‘पुतलों’ पर कपडा और,

गरीब बिना कम्बल के सोता है……..

8 Comments

  1. Vishvnand says:

    आपकी यह इक और बहुत खूब अति सुन्दर अंदाज़ की मार्मिक रचना है
    इसके कथन का मर्म सच ह्रदय को कठोरता से झकझोरता है
    जब सारा चद्दर ही फटा है कोई कहाँ कहाँ तक इसे सी सकता है
    ऐसे समय इस चद्दर को रद्दी समझ पूरा चद्दर ही बदलना पड़ता है

    इस प्रशंसनीय रचना के लिए हार्दिक अभिवादन

  2. dr.paliwal says:

    बहुत बहुत धन्यवाद सरजी….

  3. rajendra sharma 'vivek' says:

    अति उत्तम एवम प्रासंगिक रचना ,इस विषय पर ध्यान आकृष्ट किया जाना आवश्यक था

  4. s.n.singh says:

    kya baat kahi hai, subhan aalah.

  5. sushil sarna says:

    अत्यंत मार्मिक एवम प्रासंगिक रचना – अंतिम पंक्तियाँ वर्तमान सोच की सचित्र झांकी है-ऐसी उत्तम रचना के लिए हार्दिक बधाई पालीवाल जी

Leave a Reply