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आने वाले साल में शायद हों सौगातें रखीं.

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Hindi Poetry
रफ्ता रफ्ता ज़िन्दगी ने सामने बातें रखीं.
कुछ सुहाने दिन दिखाए कुछ कड़ी रातें रखीं.
 
खेल ठहरी ज़िन्दगी रहती लगी है हार जीत,
क्यों ये माने हम कि किस्मत में सदा मातें रखीं.
 
ऐ दिले मायूस रख उम्मीद तू हिम्मत न हार,
आने वाले साल में शायद हों सौगातें रखीं.
 
वक़्त आया अब बदलिए गैर मुतवाज़ुन निजाम, 
कुछ के हिस्से में क़हत क्यों कुछ के बरसातें रखीं.   गैर मुतवाज़ुन -असंतुलित, निजाम-व्यवस्था ,क़हत-अकाल  
 
अब न ज्यादा देर जादू बात का चल पायेगा,
एक तरफ रह जायेंगी सारी करामातें रखीं.
 
ऐन वक्ते वस्ले यार अड़चन पड़ी है कुछ न कुछ,
कुल शहर ही आ गया जब जब मुलाकातें रखीं.

2 Comments

  1. rajendra sharma 'vivek' says:

    प्रारम्भ की चार पंक्तियों बहुत अच्छी लगी
    वैसे तो पूरी गजल में में आपने
    जीवन के अनुभव की बात रखी

  2. Vishvnand says:

    शेर मनभाये बहुत और ग़ज़ल ये मन भा गयी
    बढ़िया हर इक शेर में जो आपने बातें रखीं
    Commends

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