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नए नगर में कोई पोथियाँ नहीं पढता,

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Hindi Poetry

करेंगे वार कुछ ऐसे निशान तक न बचे.

यकीन छोडिये साबित गुमान तक न बचे.

 

क़फ़सनुमा  है किया ता-उफ़क़ फ़लक ऐसे,

किसी भी पंख में तिल भर उड़ान तक न बचे.

 

समझ के बूझ के रद्दे अमल करें ज़ाहिर,

जवाब ऐसे  जो देंगे, ज़ुबान तक न बचे.

 

सड़क ज़रूर हुई हद से भी अधिक चौड़ी,

कहीं दरख्त, कहीं सायबान तक न बचे.

 

शहर का डौल बढ़ा इस क़दर है सुरसा सा,

नदी हुई है नदारद,श्मशान तक न बचे.

 

नए नगर में कोई पोथियाँ नहीं पढता,

किताब क़त्ल हुई है, दिवान तक न बचे.

 

4 Comments

  1. Dinesh Gupta says:

    Its nice Poem..

    I recently join this site & I am not able to post my Poem.
    Its giving error like ” you do not have suffecient Permission”

    can you please advice for this.

    Thanks,
    Dinesh Gupta
    9028299524
    dinesh.gupta28@gmail.com

  2. rajendra sharma'vivek' says:

    Agar rachate isi tarah gajal
    yakin maniye naye kirtimaan rache

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