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रुक के तनहा कभी बैठ कर सोचना,

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Hindi Poetry

रुक के तनहा कभी बैठ कर सोचना,

इस नदी में बहे हम तो पहुंचे कहाँ,

घाट सौ सौ मिले, ठाट वैभव मिले,

पर कहीं भी ठहरते कहाँ है बना.

 

साथ में सांप बहते बहाते मिले

और तिनके कई हाथ आते मिले

पाल चिथड़े हुए भग्न नावें मिलीं,

और नाविक डरे थरथराते मिले.

जो कमल भी मिला, जड़ में कीचड सना.

 

वेग था जब लहर में किनारे कटे

जब थके तो हुए और भी अटपटे,

सब सतह पट गयी कीच से गाद से,

एक कहानी बने हादसे जो घटे,

याद कर कर जिन्हें हो ह्रदय अनमना.

 

चंद लहरें मिलीं साथ में भी बहीं

छोड़ कर खो गयीं राह में ही कहीं,

मानते थे जिन्हें जान से कीमती,

मोल उनका रहा बाद में कुछ नहीं,

वक़्त की आंच में, राख, सोना बना.

 

अब न आवेग वे हैं, न वे भाव हैं,

अब शिथिल बाहु हैं, अब थकित पाँव हैं,

वायु के वेग से नाव भयभीत सी,

ढूँढती   जा रही  एक ठहराव हैं,

रह गयी बस किनारों की है कामना.

नाखुदा दे भी अब  रंच भर सांत्वना.!

10 Comments

  1. Vishvnand says:

    अति सुन्दर मनभावन रचना
    मानो जैसे सब के जीवन की उलझने और सांत्वना
    रचना में भरी हुई हैं सबकी भावना
    बहुत विरल होता है ऐसी सुन्दर रचना का जन्मना और पढ़ पाना
    हार्दिक बधाई और आपके इस अहसास की लेखनी को वन्दना ….

  2. Monika Jain says:

    जिन चीजों को पाने के लिए हम जीवन भर भागते है सच में उनका कोई मोल नहीं होता . जिन्दगी का असली उद्देश्य क्या है यहीं कोई समझ नहीं पाता. जीवन की यथार्थता का चित्रण करती बहुत ही सुन्दर रचना.
    आभार.

  3. santosh bhauwala says:

    आदरणीय सिद्धनाथ जी ,बहुत खूब !!! खूबसूरत भावनाओं की गागर छलका दी आपने!!!बधाई
    संतोष भाऊवाला

  4. nitin_shukla14 says:

    आपने अपनी खूबसूरत शब्दावली का प्रयोग कर इस रचना में जीवन का संचार कर दिया है , सिंह साहब इस खूबसूरत रचना के सृजन के लिए हार्दिक बधाई

  5. pallawi says:

    bohut2 badhai itni sundr rachna k liye!!

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