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आक्रोश

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Anthology 2013 Entries, Hindi Poetry

हाँ ..
आज तो बरसेगी ही
मन सूख कर चट्टान और वीरान जो हो गया

गुबार और घुटन के बादल से
आसमान सघन है तो बारिश तो होगी ही
बूंदें बरसेगी ही ..

इतना बरसो ..
मन की मिटटी दलदल हो जाए
तुम्हारी तीखी धूप भी इसे सुखो न पाय

परन्तु भय है
मिटटी, दलदल, बारिश
और धुप पाकर आक्रोश के बीज पनप न जाए

5 Comments

  1. kusumgokarn says:

    Pallavi,
    Beautiful poetic expression of highly emotive thoughts.
    Well chosen vivid words that slowly build up the tempo of thought flow towards a crescendo of a sincere cry from the heart.
    Kusum

  2. s.n.singh says:

    sundar kavita परन्तु शब्दों की त्रुटी दिल तोड़ देती है, सुधर लेंगी तो बेहतर होगा- विरान- वीरान,बिज- बीज,धुप-धूप,सुख कर-सूख कर

    • pallawi says:

      @s.n.singh,
      bohut bohut dhanyabaad aapka !
      maine sudhaar kar diya hai ,sahi hai ki trituyaan rachnaaon ko bigad deti hain .aage se dhyaan rakhungi dekh kr publish kru!! dhanyabaad aapka!!

  3. dr.ved vyathit says:

    अति सुंदर अभिव्यक्ति में चार चाँद लगा रखे हैं ममेरी और से भुत २ बधाई और शुभकामनायें

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