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महफ़िल…

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Hindi Poetry

शाम होते ही यारों की
महफ़िल का दौर शुरू होता है…!

कोई अपनी मोहब्बत को
उस महफ़िल में ले कर आता है…!

तो कोई उस महफ़िल में आ कर
अपनी मोहब्बत को पाता है…!

शाम, शायरी और शबाब की
ऐसी तो गज़ब मिलावट होती है…!

चारो और यारों की बस
एक ही खिलखिलाहट होती है…!

कुछ मतलब के होते है,
और कुछ बेमतलब के होते है…!

पर महफ़िल में साले
फ़िज़ूल के खर्चे बहुत होते है…!

कुछ लोगों के होते है,
तो कुछ हमारे भी होते है…!

महफ़िल में दोस्ती और मोहब्बत के
चर्चे बहुत होते है…!

-अमित टी. शाह (M.A.S.)
25th November 2011

4 Comments

  1. Vishvnand says:

    भाई वाह इस महफिल का भी मज़ा आया
    अच्छी लगी रचना …

    हर महफिल इक बात अलग सी होती बड़ी निराली
    कुछ तो खुद को “फिल” कर जाते कुछ रह जाते खाली 🙂

  2. amit478874 says:

    आप का तह दिल से सुक्रिया सरजी… हमारा उत्साह बढ़ाने क लिए…! Thanks a lot… 🙂

  3. Pratap Narayan Singh says:

    बहुत अच्छे !!
    बहुत अच्छे हैं आपके विचार
    बस यही न समझ सका कि
    यह कविता है या समाचार !

    कविता के नाम पर
    बस तुकबन्दियाँ करते रहो
    सफेद कागजों को
    दिल के उद्गारों से भरते रहो

  4. Harish Chandra Lohumi says:

    वाह रे महफ़िल, वाह रे यार,
    कहाँ गम हुए वो फाइव स्टार 🙂

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