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भीड़ से परे

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Hindi Poetry


ज़िन्दगी की चारदीवारी के भीतर
जाने कितने बार चाय के साथ खौलती हूँ मैं………………!!

दुध के भगौने में कितनी बार उबलती और उफनती हूँ मैं
और कई बार झाघ की तरह बैठ जाया करती हूँ मैं …..!!

चौखट की तरह उम्मीद के आने का इन्तजार करती हूँ मैं
पंखे की तरह घूम घूम कर शीतलता खोजती हूँ मैं……….!!

दीवारों की तस्वीरों की तरह मुस्कुराती तो हूँ
परन्तु समय की धुल मुझे धूमिल कर देती है…………..!!

और जब कभी ये चारदीवारें आसपास नहीं होते

सड़कों की तरह नितांत अकेली तो कभी
इमारतों की तरह अपने ही जड़ो को खोजने कोशिश……!!

कभी देवदार की तरह शांत तो कभी बरगद
की तरह भयावह और अक्सर सड़क के खम्भे
की तरह हृदयहीन हो जाया करती हूँ मैं…………………….!!

भीड़ में खड़े होकर भीड़ बनने की कोशिश
मुझे भीड़ से परे कर देती है…………………….!!

12 Comments

  1. Reetesh Sabr says:

    वाह पल्लवी जी…आपके बिम्बों ने इस नित बदलते जीवन को एक और मुस्कराहट के रंग में दर्शाया है..

  2. Vishvnand says:

    सुन्दर रचना बहुत मन भायी
    रचना भी अलग सी भीड़ से परे ही पायी
    हार्दिक बधाई

    (कुछ जगह शब्दों की गलतियां ज़रा ध्यान से सुधारली जांय)

  3. Harish Chandra Lohumi says:

    सुन्दर भावनाओं का तुलनात्मक बिम्ब ! बधाई !!!

  4. siddhanathsingh says:

    ज़िन्दगी के चारदीवारी के भीतर
    इसमें ज़िन्दगी की लिखना चाहिए, इसी तरह-
    भीड़ में खड़े होकर भीड़ बनने की कोशिश
    मुझे भीड़ से परे कर देता है…………………….!!

    इसमें मुझे भीड़ से परे कर देती है लिखना चाहिए, इतनी सुन्दर रूपक्युक्त रचना में लिंग सम्बन्धी त्रुटी अच्छी नहीं लगती पल्लवी जी.

  5. kishan says:

    pallwi ji bahut sundar rachna ………

  6. dr.ved vyathit says:

    पहले से तो भुत ही अधिक सुंदर लिखा है बधाई व् शुभकामनाएं पर एक दो जगह सुधार की गुंजायश है स्वयम दुबारा पढ़ेंगी तो पता चल जायेगा

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