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कैसे जियें ज़िंदगी

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Hindi Poetry

जब तक ये सवाल है कैसे जियें ज़िंदगी
जवाब ही तो जाल है कैसे जियें ज़िंदगी

मुश्किलों का सामना करके ही तो जानना
जो न खून में उबाल है कैसे जियें ज़िंदगी

ज़मीर जो लगने लगा है कि जैसे लाईमान
हर आईना एक चाल है कैसे जियें ज़िंदगी

दर्द क्या हमदर्द क्या और है कौन चारागर
हराम हो चला हलाल है कैसे जियें ज़िंदगी

तुम क़ामयाब हो रहो हम हाशिए पे भी नहीं
आँख में अटका बाल है कैसे जियें ज़िंदगी

सच के बदन पे पैराहन न बच सका कभी
‘सब्र’ बहुत भेड़चाल है कैसे जियें ज़िंदगी

6 Comments

  1. rajdeep bhattacharya says:

    its great to read your poem
    Loved it

  2. Vishvnand says:

    वाह क्या बात है बहुत सुन्दर अंदाज़

    अल्लाह ने भेजा यहाँ है जीने को हमें
    ट्रेनिंग नहीं न सब्र भी कैसे जियें जिंदगी I 🙂

  3. वक्त आयेगा जरुर एक बार सच्चे इन्सान का
    तब तक चलते रहना मुसाफिर ऐसे जिए जिंदगी
    रितेश भाई आपकी यह गजल पसंद आई

  4. dr.paliwal says:

    वाह ! लाजवाब….. मजा आ गया पढ़कर……

  5. siddha Nath Singh says:

    नंगा सच भी श्रेयस्कर है
    मिथ्या से हर चंद सुघर है .
    लाख पहिन लो सोना चांदी
    सारा तो फबता तन पर है ,
    तन सच है आभूषण झूठे
    सम्जः न इंसान पता पर है .

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