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बेगानों की बस्ती थी , अपने ही ज़रा कम थे.

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Hindi Poetry
बेगानों की बस्ती थी , अपने ही ज़रा कम थे.
फिर किसके लिए आखिर हैरान भला हम थे.
 
दिल का तो पता किसको,बातों में थी हमदर्दी,
क्यों ज़ख्म हुए ताज़ा ,सब लाये तो मरहम थे.
 
दिल तंग  चिरागों के  पुरनूर रहे  शब भर,
पर देख   उजालों को , बेनूर सुबह  दम थे. 
 
गम खूब फला फूला सैराब हो  अश्कों से,   सैराब-सिंचित
मुद्दत से दिले वीरां में दर्द के मौसम थे.
 
 समझे  थे  जिन्हें मोती हम शब के  अँधेरे में,
देखा जो सुबह पाया सब क़तराये शबनम थे.
 
इस हस्तिये फानी में किसको है सबात आखिर,   हस्तिये फानी-क्षणभंगुर, सबात-स्थायित्व
सब दफन हैं क़ब्रों में जो हुस्ने दो-आलम थे.
 
पत्थर में बदल डाला हालात की सोजिश ने,   सोजिश-आंच
इस दिल में कभी होते अहसास मुलायम थे.

One Comment

  1. Vishvnand says:

    वाह, बहुत सुन्दर हर शेर… बधाई

    गिरने को थी सरकार सदस्य बहुत कम थे
    उनको बचाने आये अमर और मुलायम थे

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