« »

chal rahe

0 votes, average: 0.00 out of 50 votes, average: 0.00 out of 50 votes, average: 0.00 out of 50 votes, average: 0.00 out of 50 votes, average: 0.00 out of 5
Loading...
Hindi Poetry

चल रहे थे जब हम अनजान राहों पर,

 

चल रहे थे जब हम अनजान राहों पर,

मिला था हमे कोई उन्ही राहों पर

भटक रहे थे जब हम उन राहों पर 

मिला था वोह तभी हमे उन राहों पर

खु हुए थे हम बहुत यु उसे मिलकर ,

 वोह राहे भी अपनी सी लगने लगी थी तब 

कोई था ऐसा जिसकी बातो में हम खो जाते थे 

डूब जाते थे हम उनकी बातो में कुछ उस तरह 

कोई  था जो न जाने क्यों इतना अपना सा लगता था ,

कोई था जो बहुत प्यारा लगता था 

कोई है जिसे हम आज भी याद करते है 

पर वो कोई ना जाने अब कहाँ  है 

पता नहीं कहा खो सा  गया उन अनजान राहो पर 

ना जाने वोह अब कैसा होगा 

फिर दुबारा क्यों ये रIहे अनजान सी लगने लगी 

चल रहे थे हम अनजान राहो पर                                   

                                                                        ज्योति चौहान

बी-२७, सेक्टर-२२, नॉएडा-२०१३०१,

3 Comments

  1. Narayan Singh Chouhan says:

    सबसे पहले तो आपका साहित्य की दुनियाँ में स्वागत ……

    आज ही रचना देखी ….
    रचना पर टिप्पणी नही करूगां ,क्योकि में बहुत बड़ा साहित्यकार नही हूँ /

    मिले किसी को राह गर ,हो आसाँ चलना /
    मेरे जलने हो रोशन जीवन गर ,
    मुझको गवारा है ऐसा जलना //

  2. Aditya ! says:

    स्वागत. एक उम्दा रचना से शुरुआत. लेकिन और बेहतर लिख सकती हैं आप.

  3. siddha Nath Singh says:

    bahut khoob

Leave a Reply