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mere guru

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Hindi Poetry

‘’मेरे गुरु’’

तिनके ने झुकना सिखलाया,
चींटी ने मेहनत करना……………..

लेकर साथ चलो तुम सबको,
अविरल नदियों का कहना………

सागर से भी सीखा मैंने,
शांत-गम्भीर बने रहना…………..

मदमस्त पवन के झोंकों ने
सिखलाया, अल्हढ़ता से जीना…………..

याद करूँ जब सागर-माथ को, (सागर माथ – हिमालय)
आ जाता अडिग अचल रहना……..

दुर्गम मंजिल दुर्लभ लगती जब,
प्रेरित करता, धरती का सहना………………..

कण-कण में मुझको दिखता है,
रूप मुझे मेरे गुरू का……………..

आज नमन करती हूँ, उन सबको,
शिक्षा जिनकी बनी गहना…………..

(शिक्षक दिवस को मेरी हार्दिक श्रृद्धांजलि)

सुधा गोयल ’’नवीन‘‘

4 Comments

  1. Vishvnand says:

    बहुत खूब, सुन्दर प्यारी सी ये रचना
    मनभावन निराली अर्थपूर्ण गुरु वन्दना ….

  2. s n singh says:

    sundar prerak rachna.

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