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chal rahe the hum anzaan raho par

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Hindi Poetry

चल रहे थे जब हम अनजान राहों पर,

 

चल रहे थे जब हम अनजान राहों पर,

मिला था हमे कोई उन्ही राहों पर

भटक रहे थे जब हम उन राहों पर 

मिला था वोह तभी हमे उन राहों पर

खु हुए थे हम बहुत यु उसे मिलकर ,

 वोह राहे भी अपनी सी लगने लगी थी तब 

कोई था ऐसा जिसकी बातो में हम खो जाते थे 

डूब जाते थे हम उनकी बातो में कुछ उस तरह 

कोई  था जो न जाने क्यों इतना अपना सा लगता था ,

कोई था जो बहुत प्यारा लगता था 

कोई है जिसे हम आज भी याद करते है 

पर वो कोई ना जाने अब कहाँ  है 

पता नहीं कहा खो सा  गया उन अनजान राहो पर 

ना जाने वोह अब कैसा होगा 

फिर दुबारा क्यों ये रIहे अनजान सी लगने लगी 

चल रहे थे हम अनजान राहो पर                                   

                                                                        ज्योति चौहान

बी-२७, सेक्टर-२२, नॉएडा-२०१३०१,

4 Comments

  1. Kuch dil ki baat keh dee apne… Behtareen

  2. Vishvnand says:

    P4poetry मंच पर आपका हार्दिक स्वागत .
    रचना का अंदाज़ ए बयाँ कुछ ख़ास और खूबसूरत है
    बहुत मन भाया और रचना भी
    पर हिंदी में कुछ सुधार की आवश्यकता है जिसे आप edit कर ध्यान से सुधारिए और अच्छी rating के लिए …

  3. s n singh says:

    बहुत खूब,
    दिल को समझा रहे हैं ये कह कर
    फिर मिलेंगे कि गोल है दुनिया .
    राहे अनजान पर ज़रा तू देख ,
    नक्शे पा उनके बोल है दुनिया.

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