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ऐसा बने सुयोग

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Aug 2011 Contest

छार-छार हो
पर्वत दुख का
ऐसा बने सुयोग

गलाकाट
इस कंप्टीशन में
मुश्किल सर्वप्रथम आ जाना
शिखर गए पा
किसी तरह तो
मुश्किल है उस पर टिक पाना

सफल हुए हैं
इस युग में जो
ऊँचा उनका योग

बड़ी-बड़ी
‘गाला’ महफ़िल में
कितनी हों भोगों की बातें
और कहीं टपरे के नीचे
सिकुड़ी हैं
मन मारे आँतें

कोई हाथ
साधता चाकू
कोई साधे जोग

भइया मेरा
बता रहा था
कोचिंग भी है कला अनूठी
नाउम्मीदी की धरती पर
उगती है
करिअर की बूटी

सफल बनाने का
असफल को
सर्वोत्तम उद्योग

4 Comments

  1. s n singh says:

    achchhi rachna, kavita kosh puraskaar kee badhayi len.

  2. abanish says:

    सिंह साहब, सादर नमस्कार. बहुत बहुत धन्यबाद.

  3. abnish singh says:

    बहुत-बहुत धन्यबाद, सोनल जी

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