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जाने कहाँ तू रहता रब्बा देख तो क्या क्या गुज़रा है,

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Hindi Poetry

जाने कहाँ तू रहता रब्बा देख तो क्या क्या गुज़रा है,

ख़त्म भी कर ये रात अज़ाबी, कितना अरसा गुज़रा है.  अज़ाबी-संकटपूर्ण,कष्टमय

 

हाथ पे हाथ धरे बैठो तो मैं न बदलने वाला हूँ,

सायातलबों को समझाता वक़्त ये कहता गुज़रा है.   साया तलबों-छांह के इच्छुक

 

दिल को यकीन नहीं होता है फिर भी पगला खुश कितना,

आने वाला है तू ऐसा कान से चरचा गुज़रा है.

 

उसको शायद डर था मुझको खबर न लग जाये उसकी,

दोस्त पुराना आज गली से चुपका चुपका गुज़रा है.

 

न्याय की आँखों पर पट्टी है, इन्तिजामिया   बहरी है, इन्तिजामिया-व्यवस्था, कार्यपालिका

रोज़ इधर से बहरे के संग शान से अँधा गुज़रा है.

 

नूर महल के पांचो खम्भे खुद तो सही सलामत हैं,

छत तड़की है,फटी फ़सीलें, नींव से झटका गुज़रा है. फसील-दीवार

 

सपनो के सौदागर सीपें रंग बिरंगी लाये हैं,

ख्वाब मोतियों के दिखलाता हरिक रहनुमा गुज़रा है.

4 Comments

  1. chandan says:

    ग़ज़ल सुन्दर, ग़ज़ल का हर शेर सुन्दर,हर शेर का हर शब्द सुन्दर. अब और समझ में नहीं आरहा इस रचना की तारीफ़ में और क्या कहूँ

  2. prats says:

    jaane kahan ji rhe the hum bhi,
    in sbdon se mehki duniya se chhod kar
    aaj pd liya is gazal ko to lga
    koi ehsaas dil ko chhu kar guzra hai…………

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