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ज़िन्दगी कौन से मोड़ पर आ गयी!

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Hindi Poetry
ज़िन्दगी कौन से मोड़ पर आ गयी!
 
खुद ही खुद के लिए अजनबी हो गए.
आत्मा और मन मुद्दई हो गए.
दर्ज ब्यौरे महज हानि के, लाभ के,
आदमी चलती फिरती बही हो गए.
भग्न  सम्बन्ध सब, छद्मता छा गयी !
 
सन्न सुधियाँ हुईं मोह मुंहफट हुए.
नेह निर्मूल से, लोभ उत्कट हुए.
जिनके नीचे पनपती न संवेदना,
स्वार्थ शतमूल विस्तृत विकट वट हुए.
वृत्तियाँ जो  सुकोमल थीं  पथरा गयीं.!
 
जो भी अवदात था कालिमावश हुआ.
जो भी अम्लान था युक्तकल्मष हुआ. 
मन जो था भावनाओं की भागीरथी,
सो कलुषकीचवाही नदी बस हुआ.
गाद जिसकी निठुर, मछलियाँ खा गयी !

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