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आज फिर…….

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Hindi Poetry

आज फिर लौट आया हूँ,

फिर वहीँ थक-हारकर लौट आया हूँ,

कितना रोका था सबने……,

सबने ही नहीं इस मन ने भी…..!

पर तब सुनना लिखा ही कहाँ था मेरे भाग्य में,

उड़ने का मन था- पर पंखा न थें,

कुलांचे मारना चाहता था – पर पाँवों में दम न था,

प्यार के गीत गाना चाहता था – पर साज कहाँ थें,

…..जानता था कि कमज़ोर हूँ पर फिर भी –

भोर होते ही उड़ चला था,

दिन चढते ही कुलांचे भरने लगा था,

बिना साज सजाये ही प्यार के गीत गाने लगा था,

आत्ममुग्ध था – मंत्रमुग्ध था – अपने में ही गुम था,

और मेरे आस-पास सब मुझे यूँ देख मुस्कुराते थे,

आखिर उनकी यह मुस्कराहट ही जीत गई,

शाम होते न होते – दिन के ढलने तक,

मेरे हाँफने ने मेरी कमजोरियों को उघाड़कर रख दिया,

और फिर………,

आज फिर लौट आया हूँ किसी घटाटोप की तरह.

—————-

–    नीरज गुरु “बादल”

                      भोपाल 

3 Comments

  1. siddha nath singh says:

    khoobsoorat rachna.

  2. Vishvnand says:

    सुन्दर सारा उन्माद समझाती अभिव्यक्ति और
    बड़ी मनभावन रचना और इसके साथ आपका यहाँ बहुत समय बाद आज आना भी ,,,,
    हार्दिक बधाई

  3. Narayan Singh Chouhan says:

    बहुत अच्छी रचना है /

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