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अपनी कहानी

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Anthology 2013 Entries, Hindi Poetry

देखते देखते बीत जाता है दिन –
हो जाती है शाम.
अख़बार के पन्ने बे पलटे रह जाते हैं.
फिर से नहीं धुल पाती परसों रात की थाली.
कपडे मुड़े चुमड़े बेतरतीब पड़े ही रह जाते हैं.
सब कुछ कर लेने की कोशिश में
रह जाती है कई चीजें अधूरी.

आकाश के एक कोने को पकड़ कर
तारों की गिनती करने की जिद –
जिद से आदत में तब्दील हो जाती है.

बारिश की बूंदें शरीर के दायें हिस्से को
धीरे धीरे गीली कर रही हैं –
देखकर भी शरीर अपनी जगह से नहीं हिलता.

बारिश न तो अच्छी लगती है ना ही बुरी.
बुरे और अच्छे के बीच की सीमारेखा का होना
ना होना औचित्यहीन हो जाता है.
कोई भी अच्छी चीज उतनी ही बुरी लगती है
जितनी कोई भी बुरी चीज अच्छी.

सड़क के किनारे पड़े कुत्ते
बड़े विद्वान दार्शनिक से जान पड़ते हैं.
एक के बाद एक यादें आती रहती हैं.
आँखों की नमी महसूसने की इच्छा भी महसूस नहीं होती.

कुछ था कभी जो छूट गया था –
की सोच में वक्त फिसल जाता है –
वैसे ही जैसे थोड़ी देर पहले
कच्ची सड़क पर एक बच्चा फिसला था.

कई चेहरे
खयालों में आ आ कर
गुम हो जाते हैं.

जीवन
एक काली सफ़ेद ईरानी फिल्म की तरह
चलता प्रतीत होता है.
भाव दिखते हैं,
भाषा समझ नहीं आती.
दूर कहीं बाख का संगीत बजता है –
नेपथ्य ध्वनि की तरह.

बिखरे हुए संगीत और सिमटे हुए संसार में
अपना होना –
एक फिल्म में चुपचाप खड़े रहने जैसा लगने लगता है.

अपनी ही कहानी में
आप अजनबियों की तरह पड़े रह जाते हैं.
देखते देखते बीत जाता है दिन
और शाम बहने लगती है.

2 Comments

  1. siddha Nath Singh says:

    what a gem of poetry, allah kare zore kalaam aur ziyada.

  2. Vishvnand says:

    बेहतरीन और बड़ी मनभावन रचना है
    इक माहौल रच दिया बड़ा सुहाना है
    पढ़कर दिल अपनी हालत सुन बाग़ बाग़ हो जाता है
    बहुत कुछ सोच में पड़ सा जाता है
    इस रचना की प्रशंसा को शब्द ढूँढ़ता है

    Hearty Kudos
    Stars 5 + + +

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