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समरांगन में नाच रही तलवार नहीं,रक्कासा.

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Hindi Poetry
समरांगन में नाच रही तलवार नहीं,रक्कासा.   रक्कासा -नर्तकी
नरपुंगव बन वृहन्नला बस देते विजय दिलासा. 
 
पूँजी की बस चकाचौंध है नियम नीति के आड़े.
स्वार्थ व्यक्तिगत बना रहे हैं घर घर नित्य अखाड़े.
 
सब आवास हुए सड़कों पर दूकानों के पीछे.
संबंधो पर हद तक हावी लक्ष्मी नैन तिरीछे.
 
गिरते जीवन मूल्य निरंतर वृद्धिमान महंगाई.
कृष्ण कन्हैया कलपें भूखे, चूहे चखें मलाई.
 
चाल चरित्र निरर्थक केवल पूजी जाती चांदी.
सत्ता अक्सर क्यों दिखती है नगर सेठ की बांदी.
 
धन में सारे गुण धनात्मक क्यों समाज ने माने
निर्धन हैं गुणहीन गणित में, जो पढ़ते हैं स्याने.
 
सूरज राहुग्रस्त फिरते हैं जुगनू जगमग डोलें.
पंगु न अब गिरि चढ़ें कृपा से प्रभु की, मूक न बोलें.
 
महंगाई की मरणान्तक है मार न जुटती रोटी.
किश्त क़र्ज़ की भरते भरते लुटने लगी लंगोटी.
 
अर्थ व्यवस्था अनगिन जन की खातिर व्यर्थ व्यवस्था.
बेचो खुद को सुख जो चाहो, रखती शर्त व्यवस्था.
 
सभी मसीहा एक सरीखे कोई कहीं न अंतर.
वेश अलग है लेकिन  मिलते  सबके मारक मंतर.
 
उनके पैमाने पर मिलती अब मनुष्यता बौनी.
सत्य सदिच्छा की मिलती है कीमत औनी पौनी.
 
लड़ने लगीं विकट हिंसक हो स्वयं पेड़ से शाखें.
बने भीष्म ध्रितराष्ट्र,  हुईं हैं ज्योतिविहीना आँखें. 

3 Comments

  1. सिंग साहब की अद्भुत रचना ,तृप्त सृजक की प्यास
    गहरे अर्थो को पहचाना ओ सरस्वती के दास

  2. Vishvnand says:

    बहुत बढ़िया ; अति सुन्दर और मार्मिक …!

    अब (2017) तो शायद बदल रहा सब , नए हाथ है सत्ता
    ये रचना पढ़ना ही न जाने, तब (2011) के जो थे मसीहा …!:)

    Came to read this poem only today….! Very Lovely…! Hearty commends, S N Singhji..!

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