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अब अगर है प्यार धोखा क्यूँ न धोखा खाइए.

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Apr 2011 Contest, Hindi Poetry
अब अगर है प्यार धोखा क्यूँ न धोखा खाइए.
ये भरम ऐसा कि जिसमे उम्र भर भरमाइये .
 
आंसुओं से धो के खाते हैं फरेबे इश्क सब,
इस लिए धोखा कहें इसको जहाँ भी जाइए.
 
शब्द सारे अर्थ विरहित हैं विरह के ताप से,
यार के अलफ़ाज़ सुन कर और झुलसे जाइए.
 
हैं मिलन की चाँद घड़ियाँ छोडिये शिकवे गिले,
आप को बहलायें हम और आप हमें बहलाइए.
 
फिर तो उसके बाद जीने की किसे दरकार हो,
आप के लब का मिले अमृत औ’ फिर मर जाइए.
 
अब न चलने पायेगी कुछ वक़्त की धोखाधड़ी ,
आँक ली छवि आँख में अब तो कहीं भी जाइए. 

2 Comments

  1. Vishvnand says:

    bahut khuub
    अब न चलने पायेगी कुछ वक़्त की धोखाधड़ी ,
    आँक ली छवि आँख में अब तो कहीं भी जाइए. ..kyaa baat hai..

  2. s.n.singh says:

    thanks for the kind words Vishv ji.

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