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दोस्त बदल गए ..

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Hindi Poetry, Jul 2011 Contest
साथ में  निकले थे घर से, इरादे थे मजबूत
दोस्तों का साथ था ,थे नशे में चूर ,
मंजिलो पे साथ पहुँचने का इरादा था ,
साथ रहेंगे हरदम एक दूसरे से वादा था,
कई सारे सपने थे जो पूरे करने थे,
अधूरे ख्वाबो के चित्र में रंग सुनहरे भरने थे.

घर से बस यूँ ही निकले थे, नादान थे
जीवन है कठिन बहुत, इस सत्य से अनजान थे .
रास्ते की दुश्वारिया इतनी होंगी,सोचा न था
इरादों की अज्माइशे  इतनी होंगी, सोचा  न था
डाल दिए किसमत ने पैरो में फंदे,
किस्मत,इतनी तेरी फर्मायिसे सोचा न था.

ज़िन्दगी में आये कुछ मोड़ ऐसे,
दोस्त सारे गए हो छोड़ जैसे,
रेस में ऐसे लगे सब ज़िन्दगी के,
तोड़ गए प्यार के नाजुक से रेशे.

सोचा न था चीजे इस कदर बदल जाएँगी,
समझा जिसे था  दोस्ती वो ये रंग लाएगी,
जी भर गया दोस्ती तेरे इस नए रंग रूप से,
बस कर भला अब और क्या नए पाठ पढ़ाएगी,  

पहले दूर हो के भी जो कभी दूर न थे
आज साथ है पर साथ की लगती कमी है,
साथ रहने का था वादा हर दुःख में जिनका
आज उनकी वजह से आँखों में नमी है.

पर कुछ नहीं अब और मुझको है शिकायत
हो निहित अच्छा इसमे सबका शायद,
सब  खुश रहे जिस हाल में मिलती हो खुशिया
मै भी समझूंगा की बस यूँ ही है ये दुनिया.

सोचता हूँ मंजिले अब भी वंही है मेरी
हूँ अब अकेला और थोड़ी हो गई है देरी
पर कुछ लोग अब भी साथ है जो कह रहे है
वो देख मंजिल देखती है राह तेरी,
था शाम वो जो कट गया अब है सवेरा
उठ आगे बढ़ और ले ले जो बस है तेरा.

5 Comments

  1. Vishvnand says:

    अच्छी रचना.
    मन भायी
    कुछ गलत छपे शब्द ध्यान से edit कर सुधार लीजिये.

    सम्हलना क्या गर डगमगाए ही नहीं
    मंजिल पाने की खुशी क्या गर रास्ते में कठिनाई नहीं ….

  2. abhinav says:

    बहुत शुक्रिया विश्वनंद जी .. यह रचना अपनी आपबीती है इसलिए बोल बहुत अच्छे न हो के भी मुझे ये प्यारी लगती है.. मार्गदर्शन के लिए धन्यवाद .

  3. Harish Chandra Lohumi says:

    रचना के अंतिम चरण में व्यक्त आशावाद अनुकरणीय लगा !

  4. siddha nath singh says:

    sundar.

  5. Mehar Singh says:

    ये मुझे मनभावन लगी . ऐसी कविता लिखने के लिए आपका सुक्रिया .

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