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बाढ़

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Hindi Poetry
खेतो  पे  पड़ी  सावन  की  फुहार ,
लौट  आई  रूठी  हुई  बहार ,
कब  की  पलके  मेघो  को  रही  थी  निहार  ,
अब  जा  के  ख़त्म  हुआ  इंतज़ार ,
कोयले  गीत  गाने  लगी 
फसले   लहलहाने  लगी 
कृषक  का  ह्रदय  झूमने  लगा 
स्वप्न  भविष्य  का  बुनने  लगा . 
आँखे  रात  भर  जगी 
दृष्टि   तारो  पे  टंगी   ,
ओस  स्वर्ण  बिंदु  सी 
जाने  क्यों  लगने  लगी .
सूर्य  रथ  बढ़  चला 
कालिमा  कुचल  चला ,
कर्तव्य  पलक  ग्राम  का 
वोह  मनचला  निकल  चला .
पग  से  डग  भरता  हुआ 
कृषक  क्षेत्र  को  चला 
फसल  देखता  हुआ  कृषक  सोचने  लगा ,
मन प्रफ्फुलित  क्यों  हुआ ?
...................
.......हाय  रे  श्रृष्टि ,  कैसी  की  ये   अतिवृष्टि ,
प्रातः  भी  थी   न  होने  पाई ,
चारो  दिशाए   थी  घबराई ,
काल  नाद  करते  हुए 
हाय  तबाही  थी  आई .
थी  नदी  जो  शांत  कल  तक 
शांति  उसकी  खो  गई, 
थी  जो  देती  शीतल  जल 
आज  रक्त  रंजित  हो  गई ,
नदी  के  जल  में  सराबोर  सारी  धरा  हो  गई ,
कल  तक  की  हरियाली  जाने  कंहा  हवा  हो  गई .

2 Comments

  1. s.n.singh says:

    behtar.

  2. amit478874 says:

    very nicely crafted…! nice poem.. 🙂

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