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मै कल भी चलता था, और आज भी चलता हुं…!

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Aug 2011 Contest, Hindi Poetry

मै कल भी चलता था, और आज भी चलता हुं…!

कंधो से कंधे मिलाते हुए चलता हुं…
कदमो से कदम मिलाते हुए चलता हुं…
किसी की नज़र न लग जाए हमारी दोस्ती को,
इसीलिए गले में नींबू लटकाए हुए चलता हुं…!

थोडा हसते हुए चलता हुं…
थोडा हसाते हुए चलता हुं…
कोई हमें पराया न समझे,
इसीलिए सब को अपना बनाते हुए चलता हुं…!

कभी कुछ गुनगुनाते हुए चलता हुं…
कभी कुछ सुनाते हुए चलता हुं…
किसी को ये न लगे की मै रो रहा हुं,
इसीलिए शोर मचाते हुए चलता हुं…!

कभी अकेला ही रात के गहेरे सन्नाटे से
गुज़रते हुए चलता हुं…
कभी दिन भर भीड़ में किसी न किसीसे
टकराते हुए चलता हुं…
कोई देख न ले हमारी आँखों से गिरते हुए आँसूओं को,
इसीलिए इन दिनों बारिश में भीगते हुए चलता हुं…!

कभी अपने आप से झगड़ते हुए चलता हुं…
कभी अपने आप को डांटते हुए चलता हुं…
कोई हमें नफ़रत का तौफ़ा न दे,
इसीलिए सब से प्यार बाँटते हुए चलता हुं…!

कभी लड़खड़ाते हुए चलता हुं…
कभी गिरते हुए चलता हुं…
किसी “इंसान” का सहारा न बन सका,
इसीलिए बैसाखी को सहारा देते हुए चलता हुं…!

-Amit T. Shah (M.A.S.)
13th July 2011

मै कल भी चलता था, और आज भी चलता हुं…!

Close to my Heart...

मै कल भी चलता था, और आज भी चलता हुं...!

5 Comments

  1. siddha Nath Singh says:

    ati sundar,nirale andaz kee rachna, bahut khoob.

  2. rajivsrivastava says:

    wah kya baat hai ati uttam rachna,ek vyatha ko bahut hi sunder dhang se prastut kiya hai–bahut bahut badahai

  3. kalawati says:

    bahut khub

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