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और आज मेरी ‘मौत’ हो गई

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Hindi Poetry

बरसो पुरानी यह बात है,
जब खूबसूरत इस दुनियाँ में
इंसानों से मेरी मुलाक़ात हो गई…!

लेकिन कुछ ही पलों में मुझे
यह महसूस हो गया था,
कि यहाँपे मेरे लिए जीना
बहुत ही मुश्किल है…
जब इंसानों के अन्दर छिपे
“अहंकार” से मेरी मुलाकात हो गई…!

फिर तो बस कुछ कम दिलों ही
मै “अमानत” बन कर रह गई,
जब “हेवानियत” एक एक कर
इंसानों में शामिल हो गई…!

मेरी हर तमन्ना परवाने की तरह
जल कर “राख” हो गई…;
जल्द ही मेरी उम्मीदों के दियें बुझ गए
और अँधेरी रात हो गई…!

आज तो “दरिंदगी” की हद ही करदी
इंसानों ने यहाँपे…
जिसे एक पल भी झेल न पाई मै;
आखिर होना क्या था,
मै भी “इंसानियत” हुं
और आज मेरी ‘मौत’ हो गई…!

-अमित टी. शाह (M.A.S.)
25th June 2011

8 Comments

  1. Hi
    Har roj insaanon ke haath ,insaniyat ka mauth hothe raahta hai . Nice composition .
    sarala

  2. siddha Nath Singh says:

    gaalib ne kaha hai naa- aadmi ko bhi mayassar nahin insaan hona.

  3. Jaspal Kaur says:

    good poem depicting truth.

  4. Vishvnand says:

    रचना और अंदाज़ बहुत सुन्दर अर्थपूर्ण और मनभावन
    इंसानियत को ज़िंदा रखने की खूबसूरत कोशिश,
    इंसानियत जब खुद महसूस करती है कि उसकी मौत हो गयी तो वो अबतक मरी नही जरूर कुछ कुछ ज़िंदा है और उसे बहुत अच्छे इलाज़ की जरूरत है…

    रचना के लिए हार्दिक बधाई

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