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‘ पिता ‘

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Hindi Poetry

          पिता ‘

 हाथों को थाम कर जिनके

मैंने चलना है सीखा ,

गोदी में जिनके सुकून भरा 

मेरा बचपन है बीता ,

विशाल हाथों में जिनके

समा जाती थी मेरी नन्हीं-सी मुट्ठी ,

उन  ‘पिता’  की स्नेह भरी आँखों में

मैंने स्वयं ईश्वर को देखा !   

– सोनल पंवार

2 Comments

  1. siddhanathsingh says:

    marmik aur sashakt rachna,badahyi ho.

  2. Vishvnand says:

    आपकी इस प्यारी सी अति सुन्दर रचना में
    पिता के प्रति श्रद्धा और वात्सल्य का आविष्कार देखा
    बहुत खूब
    हार्दिक बधाई

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