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निकलता नहीं है ये काँटा जिगर से

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Hindi Poetry
 निकलता नहीं है ये काँटा जिगर से

कि क्यों गिर गए हम तुम्हारी नज़र से.

 
सभी की रसाई कहाँ मंजिलों तक,  रसाई-पहुँच
गुजरने को गुज़रे ज़माना इधर से.
 
रहा ज़िन्दगी भर हलक़ खुश्क़ अपना,
ऐ अब्रे करम तुम कहाँ जा के बरसे.   अब्रे करम-दयालु बादल
 
जिसे देखिये लगता शोरीदासर है,   शोरीदासर-पागल
सुकूँ खो गया है कहाँ इस शहर से.
 
गुजारिश नज़र की कभी तो सुनोगे,
मिलेगी जो फुर्सत तुम्हें मालो ज़र से.
 
गिले खूब करती रही सर पटक के,
सुना कुछ न साहिल ने लेकिन लहर से.

2 Comments

  1. chandan says:

    बहुत खूब

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