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फिर न करेगा शकील तू मुहोब्बत अगर इंसान होगा…..

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जज़्बातों का खुलेगा बादबाँ आहों का फिर तूफ़ान होगा        
देखें मिलकर उनसे जीना मुश्किल के मरना आसन होगा

(बादबाँ – नाव पर बंधने वाला कपडा )
दिल लरज़ता है करके याद उनकी ज़ुल्मतें नदीम       
ज़ख्म मिट भी गए कहीं तो रूह पर निशान होगा

(लरज़ता – दर से कांपना ) (नदीम – दोस्त )

गुफ्तगू बर तक्कलुफ़ हो भी जाये खुदा साज़ बात है   
इधर की होंगी कुछ उधर की बातें न उन्वान होगा

(गुफ्तगू बर तक्कलुफ़ – असहज बातें )
फरिश्तों का जिस्म महताब सा साया मुझसे बचाए    
वजूद ख़ुद मेरा वहाँ होने पर दिल से पशेमान होगा

 (पशेमान – पछतावा ) ,(महताब -चाँद )
अबके देख लेते हैं मजबूर होकर मेरे दिल ने कहा
फिर न करेगा शकील तू मुहोब्बत अगर इंसान होगा

4 Comments

  1. siddha Nath Singh says:

    KHOOB KAHA. JULMATEN AAP NE KIS SENSE ME USE KIYA HAI SAMJAHYENGE. JULAMT TO ANDHERE KO KAHTE HAIN.

  2. Vishvnand says:

    नज़्म मन भायी
    बधाई
    अगर लफ्जों के मायने नज़्म के बीच में न देकर एक साथ नज़्म के नीचें दें तो उन्हें समझ नज़्म पढ़ने में ज्यादा मज़ा आये. ये मेरा personal सुझाव है और कुछ नहीं,

  3. jaspal kaur says:

    बडिया नज़्म बधाई

  4. swapnil says:

    Wahh shakeelsahab.. gazlon ki duniya ke Shakespeare hai aap.. har gazal itni kamal ki likhte hai, ki dil karta hai padhte hi reh jaaye.. Bahot khoob…..

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