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फट चुकी है पौ बटोही जाग रे !

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Hindi Poetry

फट चुकी है पौ बटोही जाग रे  !

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फट चुकी है पौ बटोही जाग रे  !

दूर   जाना  है  बटोही  भाग रे  !

 

बीहड़ों को देख कर तू रुक न जाना,

पर्वतों के  सामने तू झुक न जाना,

लग न जाये बुझदिली का दाग रे  !

 

धुन जगायी है तो धुन पर थाप दे,

तू सहारा  खुद को   अपने आप दे,

बुझ न जाये ये सुलगती आग रे  !

 

मंजिलें चल कर कहाँ खुद पास आतीं,

वो   खडी  है  देख  तुझको  है  लुभातीं,

पास  ही  है  वो  फलों  का  बाग  रे   !

 

दर्द   छालों  का  यहीं  पर  छोड़  दे,

गर्व से मन्जिल का ताला तोड़ दे,

वो  मिलेगा  जो  सके  तू  माँग रे  !

 

 

***** हरीश चन्द्र लोहुमी

4 Comments

  1. manojbharat says:

    aasha ka man ko jagrit karne wala swar. Nishchit hi man se har chuke logo ke man me ummid ka ujala bharega.

    Badhai.

  2. rajendra sharma 'vivek' says:

    आशाओं का संचार करता यह गीत अच्छा लगा

  3. siddha Nath Singh says:

    sundar aur prerak.

  4. Vishvnand says:

    Bahut sundar manbhavan hai ye geet
    pyaar se gungunaane kee hai badhiyaa cheez….
    rachanaa ke liye hardik badhaaii

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