« »

देखकर जन्नत उसका घर हमे याद आया है…..

4 votes, average: 4.00 out of 54 votes, average: 4.00 out of 54 votes, average: 4.00 out of 54 votes, average: 4.00 out of 54 votes, average: 4.00 out of 5
Loading...
Uncategorized

उलझे खुद और खुद को ही फिर सुलझाया है
तनहाइयों ने जीने का ये हुनर हमे सिखाया है

जिस की तपिश से जल गया मेरा वजूद सारा
सुलगता कुछ तुम्हे मेरी आँखों में नज़र आया है

खुशफेहमियों में जी रहा हो वो भी शायद
सोच बैठा है की उसने भी मुझे भुलाया है

उसकी खुशबू से तर हैं आज भी मेरी कायनात
मुद्दतों पहले जो उसके दमन को हाथ लगाया है

हर एक फ़ेल बेमकसद हर बात बेमाइने हुई  (फ़ेल – क्रिया,काम)
बुलंदियों का नशा उसपर रफ्ता रफ्ता छाया है

हर हादसे के मोती पिरो दिए मेरी खातिर
शाह ग़मों का ही सही उसने मुझे बनाया है

जब के मातम है जारी मरहूम हसरतों का
लेकर वफ़ा के तोहफे वो आया तो क्या आया है

जो गिरे हैं चुनलेगा गुलचीन उन्हें भी कभी  (गुलचीन – माली)
घर में उसके देर है नहीं अँधेरे का साया है

ले गए फ़रिश्ते उसकी बारगाह में हमे शकील
देखकर जन्नत उसका घर हमे याद आया है

4 Comments

  1. vmjain says:

    वाह! शकील भाई! आप का अंदाज़ ही निराला है . दिल खुश हो जाता है.

  2. siddha Nath Singh says:

    bahut bathtar, subhan allah. andhere ko andher kar deejiye penultimate sher me.

  3. Pooja says:

    बहुत ख़ूबसूरत है लिखावट…
    इस लिखावट का क्या कहना…
    मुझे तो डर है … कुछ ज्यादा कहकर
    मै कोई खता न कर दु…!

    लाजवाब है….बस्स…!

  4. swapnil says:

    Wah shakeel sahab wahh… alfaz nahi hai mere, is gazal ki taarif ke liye…

Leave a Reply