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रो न पड़े वो सुनकर हालत मेरे शकील देखना…..

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सजदे किये बहुत हाथ उठे न कभी दुआ के लिए
मिला जो मिला गुंजाईश न थी इल्तेजा के लिए
 
मकसूद थी राहत ग़म-ए-हस्ती से ज़ालिम मुझे
मैंने कब कहा था बेमेहर तुझे दवा के लिए
 
(मकसूद – जिसकी चाहत हो)

 
तश्नगी लिखी थी मुकद्दर में तो तस्लीम किया
 डूब कर भी तश्ना लौटे हैं तेरी रज़ा के लिए
 
(तश्नगी – प्यास)

(तश्ना – प्यासा)

 
ख्यालों में भी जो गया बेइरादा आपके कभी
पशेमान रहे ताउम्र ख्याल अपनी खता के लिए
 
(पशेमान- पछतावा)
 
ताखीर कुछ आने में हुई थी उनके कल रात 
कातिल तक पहुंचे हैं हम आप अपनी सजा के लिए
 

(ताखीर- देर, विलम्ब)

 
रो न पड़े वो सुनकर हालत मेरे शकील देखना
मिले जो कुछ न कहना तुम उसे खुदा के लिए

4 Comments

  1. Jaspal Kaur says:

    बहुत खूबसूरती से अपनी भावनाओं को आपने पेश कियाहै. बधाई.

  2. Vishvnand says:

    बहुत खूबसूरत ऐसी ख़याल ए नजाकत
    कहाँ से लाई अपने हमें सुनाने के लिए
    वाह वाह , बहुत खूब मनभावन
    commends

  3. kusum (pooja) says:

    mujhe ek baat poochni hai aap se shakeel jee…
    aapka inspiration kaun hai…?

    itni khoobsoorat batein likhte hai aap…jeeske liye likhte hai..
    woh khushnaseeb kaun hai…?

  4. vmjain says:

    अपनी भावनाओं का बयाँ करने का खूबसूरत अंदाज़. अच्छा लगा.

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