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शायद मंजिल ही है, मुझे बुला रही है……

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Hindi Poetry

शायद मंजिल ही है, मुझे बुला रही है……

 दिल में जज्बात, उबल रहे है  ,

बाहर आने की तड़प में, जल रहे है,

बंदिशे इस कदर, घेरे है हमें,

सब साथ है पर, तनहा चल रहे है,

 

मुकाम पर ना पहुंचे, गम सता रहा है,

हौसला ना जाने क्यूँ, डगमगा रहा है,

मैं मंजिल के करीब, जा रहा हूँ,

कोई अपना उसे, दूर खींचे जा रहा है,

 

उम्मीदों के समंदर में, गोते कब तक लगाऊ,

डर है कहीं खुद से ही, ना हार जाऊ,

किरण धुंदली सी कोई, नजर आ रही है,

शायद मंजिल ही है, मुझे बुला रही है……     

14 Comments

  1. manojbharat says:

    Dr. Sahib.
    Aapki rachna saayaas rachna nahi hai, vah kal-kal krte jharano ki tarah bahati hui pratit hoti hai.
    Badhai swikaren.

  2. Harish Chandra Lohumi says:

    अंतर्द्वंद्व का अच्छा चित्रण !

  3. SARALA says:

    Hullo ,
    Manzil seeti baja rahee hai , der na karna …
    sarala

  4. s.n.singh says:

    sundar abhvyakti aur nirala andaaz.

  5. Jaspal Kaur says:

    बहुत सुंदर रचना.

  6. renukakkar says:

    अच्छा लिखा है आप ने !

  7. बहुत खूब , हर हाल में चलते रहिये , मंजिल जरुर मिलेगी

  8. shakeel says:

    चलिए साहब चलते रहिये कभी कभी मंजिल भी चली आती है दो चार क़दम मुसाफिर की रफ़्तार देख कर.

    आपने बहुत अच्छा लिखा बेहद पसंद आया

  9. Vishvnand says:

    बहुत खूब
    बहुत बढ़िया मनभावन अंदाज़ जनाब

    “किरण धुंदली सी कोई, नजर आ रही है,
    शायद मंजिल ही है, मुझे बुला रही है…… ” क्या बात है

    ये हैं ऐसी राहें जिनको भी मेरी तलाश है
    मंजिले ये ऐसीं जिनको मेरा इन्तेजार है…

  10. Ravi Rajbhar says:

    Kin shabdo se tarif karu aapke kalam ki soch nahi pa raha hun.

    dhire-2 dil me sama gai ….aur ander tak chhu liya.
    Bahut hi lambe antral ke baad aaj aapko padha hai…bahut khusi hui.
    Badhai swrikare.

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