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विद्रोह

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Hindi Poetry

विद्रोह

अंडज तोड़े अपना आवरण
जीवनदाता
पोषणकर्ता !

खगशावक छोड़े अपना नीड़
आश्रयदाता
रक्षाकर्ता !

उद्भिज उगता
चीर के छाती
उर्वर धरती की !

कभी-कभी अपना अस्तित्व बचाने को,
आगे कदम बढाने को.
बहुत कुछ सहना होता है.
अनपेक्षित भी करना होता है.

मैंने भी तो
इस अंधियारे से बाहर आने को
खुद में खुद को पाने को
रीति रूढी को छोड़ा है .
अपने मकडजाल को तोडा है.

फिर…
बाहर इतना कोलाहल क्यों है ?

-मनोज भारत

7 Comments

  1. santosh bhauwala says:

    भीतर से बाहर की यात्रा मन भायी बधाई !!

  2. कभी कभी कुछ नया परिवर्तन कोलाहल का कारण बन ही जाता है , और ऐसे परिवर्तन के लिए सर पे कफन बांध कर निकलना जरुरी है , अति सुन्दर – बधाई

  3. Harish Chandra Lohumi says:

    पढ़ते पढ़ते अन्तः को टटोल सी गयी,
    कुछ राज दे गयी और कुछ राज खोल सी गयी !

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