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सूखे पत्ते!

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Hindi Poetry

 

पेड के इर्द-गिर्द पड़े ये सूखे पत्ते,

कभी बड़ी शान से ऊँचे दरख़्त पर इठलाते थे,

हवा के हर झोखे के संग झूमते-बलखाते  थे,

ओस की बूँदो से नहाते, चिड़िया से बाते करते थे!!

 

कभी यौवन से परिपूर्ण, परिवेश की शान थे,

अपने पेड़ के पालनहार, उसकी अनूठी पहचान थे,

सूरज की तेज धूप से बचाते,खुद जल जाते थे,

अपने पेड़ की खातिर ,आँधी से लड़ जाते थे!!

 

आज बेबस बेजान ,बेमतलब से लगते है,

ललचाई नज़रो से अपने आशियाने को तकते है,

आज इनकी जगह कुछ नये पत्तो ने ले ली है,

इनके साथ तो इनकी तन्हाई भी अकेली है!!

 

अपने घर के आँगन पे बैठा ये बुजुर्ग,

कुछ- कुछ इन सूखे पत्तो सा लगता है,

जिस घर को अपने खून से सीचा था,

आज उसकी चौखट पे बैठा सूखे पत्ते सा दिखता है!!

 

 

डॉक्टर राजीव श्रीवास्तवा

 

 

15 Comments

  1. बहुत सुन्दर , बिलकुल सही कहा राजीव ,आदमी जब बूढ़ा हो जाता है तो उसका भी हाल सूखे पत्ते जैसा ही हो जाता

  2. manonbharat says:

    Dr. Shrivastav ji,
    Pratikon or rupak ke madhyam se bahut achha sandesh diya hai aapne.
    Badhai swikaren.

  3. santosh bhauwala says:

    बहुत खूब!! सटीक चित्रण सूखे पत्ते के माध्यम से बधाई स्वीकारें

  4. Pooja says:

    बहुत बहुत बधाई !!! छु गयी मन को, हमेशा युही लिखते रहे !!!

    regards,
    pooja

  5. Harish Chandra Lohumi says:

    एक अच्छी संदेशप्रद रचना ! नयी पीढ़ी को झकझोरती और बुजुर्गों का दर्द बतलाती एक मार्मिक रचना ! बधाई !

  6. dr.ved vyathit says:

    सुंदर संदेश परक रचना सामाजिक दायित्वों का निर्वह करती हुई
    बधाई

  7. Jaspal Kaur says:

    बहुत खूब. बहुत अच्छी रचना.

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