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रह-रह याद तुम्हारी आती भूले नहीं भुलाये

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Hindi Poetry

रह-रह याद तुम्हारी आती भूले नहीं भुलाये

सोचूँ क्या अपराध कि इक-दूजे के ना हो पाए

झाँक ज़रा पलकों में रक्खी जो तस्वीर सँवारे

इक बैठी गुमसुम उदास दूजा है उसे पुकारे

तन में मन का वास किन्तु कैसी विचित्र यह माया

बांधे बार-बार तन पर मन संग ले उड़े काया

मन को कहे असत्य दूर परबस तन क्यों रह आए

तन को बरज लरज मन उरझा और कहीं क्यों धाए

मन दुनिया की रीत न माने उड़ता फिरे गगन है

दुनिया मन को रह-रह बांधे कैसा अजब चलन है

झूठ कहा क्या प्यारी मैंने ज़रा सोच बतलाना

क्या जानें फिर मिलें ना मिलें क्या हो ठौर-ठिकाना

प्रेम सदा इक क्षण जीवन का भूले नहीं भुलाए

सूखें प्राण-पंखुरियाँ पर बस सुरभि सदा महकाए

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3 Comments

  1. siddha Nath Singh says:

    uttam,aakarshak kavita.

  2. Harish Chandra Lohumi says:

    ख़ूबसूरत रचना !
    खूबसूतर अंदाज़ !

  3. Vishvnand says:

    अतिसुन्दर ये रचना प्यारी
    बहुत बहुत मन भायी
    हार्दिक तुम्हे बधाई

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