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नई दिशा ढूँढ़ते निशा

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Apr 2011 Contest, Hindi Poetry

नई आस नया समा नई दिशा
हर घडी खुले आसमा पे नए निशा
नई पीड़ी की नई उमीदे
उन पर पड़े अन्होने साए का खतरा
अधूरे सपने अधूरी खुशिया
कमजोर लोगो की लुटी है दुनिया
कुछ उठते हुए कदमो के
कुछ रुके होठों की जुबानी
टूटे दिलों से रिस्ते ज़ख्मो की कहानी
ख़तम हो रही खुशी आज़ादी की
आज़ाद हो भी बंदित है वतन
फ़ैल रहे है भ्ररष्ट निशान
जल रहा है हिंदुस्तान
बेकार हो गए गीत ज्ञान
सस्ता हो गया दीन ईमान
महंगाई का वही रुज़ान
अर्थ वयावस्ता लहूलुहान
भ्रष्ट हवा ने सबको घेरा
गिर रहा है उमीदो से बना रेत का टिला

3 Comments

  1. manojbharat says:

    Kaavyansh ji
    lage raho, bahut achhe prayas kar rahi ho. Hatash mat hona. Kavya ke liye avashyak bhav v snvednaye aapmen prachur matra men hai. aage ujjwal bhavishya hai.
    Rachana karm ke liye badhai

  2. Vishvnand says:

    बहुत सुन्दर कविता और अभिव्यक्ति
    हार्दिक बधाई

    कुछ शब्द जो गलत छपे हैं अखरते हैं l उन्हें edit कर ध्यान से सुधारने की जरूरत है

  3. siddha nath singh says:

    yadi bhasha ko sahi roop me likh n payen to khed hota hai, kripaya apne shabdon ki spellings sahi kariye, zaroori samjhen to dictionary dekhen, kavita ke liye bhav agar svaar hain to bhasha samvaahak, rath. yadi vahi toote pahiye vali hogi to rsa nishpatti mushkil hai.keep trying bhai.

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