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क्रौंच वध

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Hindi Poetry

क्रौंच वध

 

पहली बार तो नही हुआ था

पृथ्वी पर क्रौंच वध

परन्तु उस की पीड़ा को

शायद पहली ही बार

अनुभव किया गया था

जिस से बह चली थी

करुणा की अजस्र धारा

जो प्लावित होती ही रही

क्यों कि उस ने नही क्या था दावा

दूसरों को द्रवित करने का

अपितु कवि स्वयम द्रवित हो गया था

उस पीड़ा से

जिस से प्रादुर्भूत हुए

महा काव्य मानवता के ||

 

8 Comments

  1. अति सुन्दर , बहुत खूब , कुछ कहने को शब्द नहीं – बधाई डा साब

  2. Vishvnand says:

    अति सुन्दर अभिव्यक्ति
    मनभावन अर्थपूर्ण रचना
    बधाई
    ४ stars

    “क्यों कि उस ने नही क्या था दावा” “क्या” को शायद “किया” होना चाहिए

    • dr.ved vyathit says:

      @Vishvnand, आप का स्नेह व् आशीष निरंतर सौभाग्य से प्राप्त हो रहा है
      हार्दिक आभार

  3. siddha Nath Singh says:

    कविता वाण चलाते निषाद से
    वाणी क्रोंच मिथुन के आर्तनाद से
    अनुगूंज अनसुनी रही नहीं
    उस दुर्घटना के बाद से .

  4. Harish Chandra Lohumi says:

    विशुद्ध हिन्दी साहित्य के दर्शन !

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