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ख्वाहिशें बेईमान होती हैं

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Crowned Poem, Hindi Poetry

भंवरे करते गूँज फिरते, तितलियाँ उड़ती हैं चुप.

ये डिंढोरा पीटें अपना काम ये करती हैं चुप

 

अपना अपना है तरीका, इश्क सबको है मगर,

बारिश मचाती शोर, बूंदें ओस की पड़ती हैं चुप.

 

कुछ बताईये तो कहाँ वो रह गई सब मस्तियाँ ?

शोरो-गुल की आदतें अब किस तरह सहती हैं चुप.

 

यूँ छुपाने से नहीं छुपते कभी दिल के गुबार,

सब ब्यां करती हैं आँखें कब भला रहती हैं चुप,

 

औरों को इल्झाम देती जो फिरें थी हस्तियाँ,

जब से देखा आईना तब से जरा बैठी हैं चुप.

 

यार की गलियों के फ़ेरे होने न देंगी ख़तम,

ख्वाहिशें बेईमान होती हैं कहां करती हैं चुप.

 

थे हंगामों के सबब इन महफ़िलों के वो फ़कत,

जबसे रुख्सत हो गये ‘चंदन’ बड़ा रहती हैं चुप.

 

                                                           -चंदन

14 Comments

  1. Vishvnand says:

    बहुत बढ़िया अंदाज़-ए- बयाँ
    खूबसूरत शेरों से सजाया समा
    मज़ा आ गया… बधाई

    कुछ नेताओं की ख्वाहिशें और बेईमानी जीते जी न होती हैं ख़त्म
    जिन्हें मालूम है राज़ घोटालों का उन्हें चुन चुन करती हैं चुप

    • chanan says:

      धन्यवाद सर आपका और आज फिर से इस इस मंच का जिसने मेरे अन्दर की रचनात्मकता को जगाया है और जो मैं महसूस करता हूँ उसे शब्दों में बाँधने के लिए प्रेरित करते हैं.
      ‘जिन्हें मालूम है राज़ घोटालों का उन्हें चुन चुन करती हैं चुप’
      कलम तलवार बन जाती है -सुना था, पर आप की तो तीर बन रही बड़ा सटीक निशाना है

      • Vishvnand says:

        @chandan
        कमेन्ट के लिए हार्दिक धन्यवाद .. आपकी p4poetry के लिए कही बात बिलकुल सही है.
        p4poetry मंच ने मेम्बरों द्वारा मेम्बरों को प्यार से जगाया है
        जिनके पास कहने बहुत था फिर भी बेबस थे और रहते थे चुप …

  2. dr.ved vyathit says:

    बहुत सोचता रहा हवा को अपने साथ बहा लूं
    बहुत सोचता रहा आज दिन डूबे नही बचा लूं
    पर दोनों ने किया व्ही जो उन की मजबूरी थी
    मुझ को भी समझाया मैं अपने मन को समझा लूं

    • chandan says:

      धन्यवाद डाक्टर साहब दुविधा की बात तो समझ गया पर मेरी रचना के बारे में आपके विचार समझने में नाकामयाब रहा मुआफी चाहता हूँ

      • dr.ved vyathit says:

        @chandan, भाई यह केवल आप की रचना के लिए ही नही अपितु मैंने तो अपने भाई के लिए भी ये पंक्तियाँ लिखी हैं ये पंक्तियाँ विशेष तौर पर आप की रचना को ही तो व्यक्त क्र रहीं हैं आप के मन के प्रति बिम्ब को पढना और उस को कहना क्या आलोचना नही है

  3. pallawi says:

    bohut achcha likha hai aapne!!

    • chanan says:

      धन्यवाद पल्लवी आपकी सराहना का जो मुझे और लिखने की प्रेरणा देगी.

  4. siddha nath singh says:

    itni achchhi abhivyakti lekin ek dosh jo khalta hai vah hai be-bahri ka, chhand santulit nahin hon to laya bhang hoti hai, apni doosari,panchavin,barahavin pankti me laya barqaraar nahin rahi shesh sheron jaisi. dhyan deejiye, bhala hoga.

    • chandan says:

      धन्यवाद सिंह साहब आपके सुझाव केलिए इन पंक्तियों पर काफ़ी कोशिश की पर लगता है फिर भी कमी रह गई
      बहर में लाने की कोशिश करता हूँ

  5. Ravi Rajbhar says:

    वाह दिल बाग़ -२ होगया.
    हर सेर अपने आपमें अदभुत….!
    बधाई हो … 🙂

  6. Abhishek Khare says:

    Bahut acche, 4 sitare meri taraf se.

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