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दृष्टिहीन!

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Hindi Poetry

रंग बिरंगी तितलियों के रंग धुल गये,

इंद्रधनुष के सात रंग जाने कहाँ उड़ गये!

 

पंछी पेड़ पर बैठे बस चूं-चूं करते हैं,

आसमान के तारे शायद यहाँ- वहाँ विचरते हैं!

 

रात ऐसी आई है की ख़त्म नही होती,

सुबह की चाहत मे ये आँख नही सोती!

 

ना कोई आकार ना कोई रंग समझ आता है,

मुझे जीने का बस एक ही ढंग समझ आता है!

 

अपने हाथो से ही दुनिया को देख लेता हूँ,

भावनाओं को मन मे ही जान लेता हूँ!

 

जिस एक पल के अँधियारे से सबका दिल घबराता है,

वही मुझे आगे बढ़ने की राह दिखलाता है!

 

रंग रूप की सुंदरता मुझे कहाँ भाती है,

मधुर वाणी ही सुंदरता का बोध करती है1

 

दृष्टिहीन हूँ पर औरो मे जीने की चाह जगा सकता हूँ,

कई भटके आँखवालो को भी सही राह दिखा सकता हूँ!

 

 

डॉक्टर राजीव श्रीवास्तवा

 

10 Comments

  1. Harish Chandra Lohumi says:

    अच्छी सन्देशप्रद रचना ! बधाई !
    आकर- आकार,
    अंधीयारे- अँधियारे,

  2. siddha Nath Singh says:

    nayan baadhit kintu drishti baadhit nahin.

  3. dr.ved vyathit says:

    बहुत सुंदर उत्तरोतर विकास यात्रा जारी है मन प्रसन्न हो गया आज की कविता पढ़ करइस गति व् प्रगति को बनये रखें मेरी हादिक बधाई व् शुभकामनायें सदा आप के साथ हैं

  4. Vishvnand says:

    रचना, इसके अंदाज़ और भाव अलग से बहुत मन भाये .
    Dr Ved जी की प्रतिक्रिया का हार्दिक अनुमोदन
    और बहुत बधाई

  5. sudha goel says:

    अति संवेदनशील रचना ! बधाई !
    सुधा

  6. sudha goel says:

    बधाई ! बधाई !

  7. pallawi says:

    bohut badhiya rachna bohut 2 badhai!!

  8. sakshi says:

    its nice

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